ओ सुरगूँजा! कुछ उन्मुक्त चित्र
(1)
नदी में नहाती औरतें
फटफटिया की आवाज सुन
पानी लपेट लेती हैं
शहर गईं औरतें
लौटी क्यों नहीं?
कौन पूछे -
बन्दूक से?
(टीप : मेरा जन्म स्थान सरगुजा, जिसे कभी सूरगूँजा भी कहा जाता था छत्तीसगढ़ राज्य का आदिवासी बहुल जिला है। यहॉं जुल्मों और शोषणों की कथा बहुत पुरानी-लम्बी और अनवरत है। 'ओ सुरगूँजा! कुछ उन्मुक्त चित्र' के द्वारा मैंने शब्दों में कुछ के रेखाचित्र खींचने का प्रयास किया है।)
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2 comments:
क्या बात है भाई. बहुत बढ़िया.
"पानी लपेट लेना...." कमाल है.
इस कविता का पढ़ कर मन भर आया. लाजवाब कविता है ये. ये कविता पढ़ कर ऐसा लग रहा है कि मैं भी कवि बन जाऊं, लेकिन डर है कि कहीं लोग मुझे गलियाने न लगें इसलिए ये पुनीत काम आपके ही जिम्मे छोड़ रहा हूँ. जय हो कवि महाराज की....जय हो...
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