
गणित में 67 प्रतिशत शिक्षक फेल !
यूरोपीय कमीशन की 'स्वाध्याय योजना' के तहत शिक्षा विभाग ने छत्तीसगढ़ के सभी जिलों में अपने शासकीय शिक्षकों के गणितीय योग्यता का टेस्ट लिया और नतीजे में 67 प्रतिशत शासकीय शिक्षक पहली से आठवीं के गणित के टेस्ट में फेल हो गये।
छत्तीसगढ़ की शिक्षा व्यवस्था में इससे ज्यादा और क्या शर्म की बात होगी। जब शिक्षक स्वयं पहली से आठवीं के आसान गणित के प्रश्नों को नहीं बना पा रहे हैं तो वे अपने छात्रों को क्या सीखाते होंगे, इस बात की कल्पना से तन-मन कॉंप जाता है।
पहले शिक्षा में प्रयोगशाला होती थी और अब प्रयोगशाला में शिक्षा है। प्राथमिक शिक्षा की गुणवता सुधारने के नाम पर नित्य नये-नये प्रयोग किये जा रहे हैं और नतीजा आपके सामने है। कभी यूनिसेफ तो कभी यूरोपीय मिशन को मूर्ख गाय बना कर खूब दूध दूहा जा रहा है और घी-मलाई से अपना-अपना घर भरा जा रहा है। भाई ! विदेशी संस्थाएं, आर्थिक सहायता देने के लिए कुलबुलाती रहती हैं तो फिर भला शिक्षा पर प्रयोग क्यों न करे, हमारे ये होनहार स्वजन।
आंकड़ो के मकड़जाल में सुन्दर और पुरस्कार-खीचूँ आंकड़ों को 'जमाने' में तो आज सब माहिर हो गये हैं। साल-दो साल में उच्च अधिकारी ऐसे ही आंकड़ों के ग्राफ में ऊपर चढ़कर एक-दो राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार 'मैनेज' कर ही लेता है। बस ! शासन को अपने प्रचार विज्ञापनों का जुगाड़ हो जाता है, बस शासन की गम्भीरता यहीं तक है और कुछ नहीं।
शिक्षकों को प्रशिक्षण देने का एक कमाऊ धन्धा शिक्षा विभाग के हाथों में आ गया है। सब कमा रहे हैं, ऊपर से नीचे तक - अधिकारी, बाबू, सामानों के सप्लायर, फर्जी टी.ए. एवं मानदेय में स्वयं शिक्षक और इसके ऑडिटर भी । शिक्षा विभाग के किसी प्रशिक्षण कार्यशाला में चले जाईये, हर आधे-एक घण्टे में चाय-पकौंड़ों के साथ खूब हँसी-ठिठोली होती मिल जायेगी। पढ़ाई यही कि कल नाश्ते में, खाने में क्या-क्या पसंद करेंगे, इस
प्रशिक्षण कार्यशाला में कितनी कमाई हो जायेगी और अगले में कितनी...फिर छठा वेतनआयोग में हम शिक्षकों का कितना भला हो जायेगा।
सरकारी स्कूल में 'मैडम' और 'गुरूजी' बच्चों को पढ़ाते कम ही मिलेंगे। या तो वे मोबाईल में गपियाते मिलेंगे या कोई अख़बार, पत्रिका के पन्ने पलटते - धूप सेंकते मिल जायेंगे।
भला हो 'मध्यान-भोजन' का, सुप्रीम कोर्ट की कड़ाई के कारण अब सभी सरकारी स्कूलों में मध्यान भोजन लगभग-लगभग नियमित रूप से मिल रहा है और इसी बहाने स्कूल भी खूल रहा है, नहीं तो दूर-दराज के गॉंवों में स्कूल साप्ताहिक हाट जैसा सप्ताह में एक-दो बार भाग्य से खुल जाता था।
गुरूजीयों में गज़ब का तालमेल होता है, जहॉं भी 2 या ज्यादा गुरूजी पदस्थ होते हैं वहॉं वे गणित के 'अल्टरनेट' नियम का पालन प्रवीणता से करते हैं और रोज सभी गुरूजी स्कूल न जाकर, आज एक तो कल दूसरा के नियम से मौज करते हैं।
शिक्षक जिन पर देश के भविष्य को दिशा देने, बच्चों के कोमल मन को एक उत्कृष्ठ कुम्हार जैसा एक लक्ष्य और आकार देने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है, वह ही वर्तमान में सबसे अधिक निकम्मा बन गया है। ये गुरूजी, पढ़ाने के सिवाय बाकी सभी चीजों में बेहद गंभीर हैं। ईश्वर भला करे! हमारा, हमारे बच्चों का...


3 comments:
दो दिन पूर्व ही यह समाचार छत्तीसगढ में प्रमुखता के साथ प्रकाशित हुआ था तो हमने यहां के कुछ शिक्षकों से इस संबंध में पूछा उनसे चर्चा के बाद हमने जो पाया वह यह था कि सवाल निचली कक्षाओं के ही थे पर जो 67 प्रतिशत शिक्षक इसमें फेल हुए वे विगत कई वर्षों से गणित शिक्षण नहीं करा रहे हैं वे भूगोल, भाषा या दूसरे विषय पढा रहे हैं इसके बावजूद भी जिनसे मैं चर्चा किया उन्होंनें अपनी गलती मानी है कि उन्हें अपडेट रहना चाहिये ।
दूसरा असंतोष जो शिक्षकों में है वह यह है कि शासन उन्हें छुट्टियों में भी गैरशिक्षकीय कार्य करवाती है जिसके कारण वे स्वाध्याय से दूर होते जा रहे हैं ।
जिन नंदकुमार जी का उल्लेख इस समाचार पत्र में आया है वे स्वयं स्वाध्यायी प्रशासक हैं ऐसे सनसनीखेज प्रकाशन का मतलब वे जानते हैं इससे शिक्षकों का मनोबल बढे यही हमारी कामना है ।
छत्तीसगढ पर पैनी नजर के लिए बधाई ।
फ़ेल तो होना ही था इनको छ्त्तीसगढ मे शिक्षा कि स्थिति दयनीय है !!
प्रश्न यह नहीं है कि फेल होने वाले शिक्षक गणित पढ़ाते थे या नहीं ?
ध्यान देने वाली बात यह है कि कोई भी शिक्षक कम से कम 10वीं/12वीं तो पास होता ही है, तो फिर ऐसे कमजोर आधार पर कोई कैसे भविष्य के मकान बनाने की जिम्मेदारी सौंपे ?
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