Monday, May 19, 2008

'राजनीति'को उद्योग का दर्जा दें...

'राजनीति' को उद्योग का दर्जा दें...

यह मांग पागलपन नहीं है, जमीनी सच्‍चाई है! भारत के वर्तमान परि‍दृश्‍य में 'राजनीति' एक उद्योग के रूप में फलने-फुलने में सभी उद्योगों से आगे है। आज राजनीति, एक प्राईवेट उद्योग के रूप में क्रियान्वित की जा रही है।

आप ही बताईये ! है कोई ऐसा उद्योग जिसने आजादी के 60 वर्षों के बाद अनन्‍त गुणा मुनाफा कमाया है ! आज सर्वाधिक धनी वही परिवार है जो 'राजनीति' में है या 'राजनीति' के प्रबन्‍ध में माहिर है।

देश (सरकार नहीं !) को घाटा यह हो रहा है कि इस राजनीति उद्योग से कमाया गये धन पर देश को काई टैक्‍स नहीं मिल पाता है। बेचारे नेतागण, अपने काले धन को छुपाने के नाना प्रकार के मनगढंत 'आय के वैधानिक स्रोत' की खोज में लगे रहते हैं। अपनी 'रबड़ी देवी' को ही लीजिए, गोबर बेचकर उन्‍होने करोड़ों रूपये 'जमा' कर लिए। बेचारा आम किसान ! आर्यों के समय से पीढि़याँ वंश दर वंश दूध/घी बेचकर भी दो जून की रोटी का मुश्किल से जुगाड़ कर पाता है।

जब राजनीति के व्‍यापार को अंतत: अलिखित रूप में हमने अपने लोकतंत्र के लिए स्‍वीकार मान ही लिया है तो इस सच्‍चाई को कानूनी मान्‍यता देने में कैसा शर्म ? आहिस्‍ते-आहिस्‍ते राजनीति ने लोकतंत्र को रखैल बना लिया और हम सब अपने-अपने छोटे-बड़े फाय़दों के लिए तमाशा देखते रहे, तो फिर 'बु‍द्धिजीवि बहस' के लिए बचा ही क्‍या है ?

मुझसे 'बहस' नहीं 'शास्‍त्रार्थ' कीजिए। बताईये, कौन सी राजनीतिक पार्टी, एक प्राईवेट लिमिटेड फर्म जैसा काम नहीं कर रही है। और निर्दलीय...?, जिसकी नीलामी सरेआम होती है ! वषों से मान्‍यता प्राप्त राजनैतिक दलों में अपने लोकतांत्रिक चुनाव नहीं हुए हैं, अगर हुए भी हैं तो सिर्फ दिखाने के चोंचले मात्र्। कितने विडम्‍बना की बात है कि और इन अलोकतांत्रिक पार्टियों को इस दुनिया के सबसे बड़े महान लोकतंत्र को चलाने की जिम्‍मेदारी दे दी गई है/दे दी जाती है।

आप जरा इस बात पर गौ़र कीजिए - नेहरू-गांधी परिवार का यह शाही खर्च क्‍या पंडित-इंदिरा-राजीव जी के मानदेय और पेंशन से चल रहा है ? फिर हमारी 'माया बहना' के खर्च का हिसाब...? समझ गये होन्गे।

आप! आप इन बड़े खिलाडि़यों से ध्‍यान जरा अपने आप-पास गली-मुहल्‍ले-गॉव-शहर के छुटभैये से तथाकथित नेताजी ! पर केन्द्रित कीजिए, उसके आय-व्‍यय पर ध्‍यान दीजिए...! मेरे क्रांतिकारी विचार की गंभीरता को आप समझ जायेंगे...अगर नहीं समझे तो...साफ है...! फिर आपका भी निश्‍चित रूप से कोई
छोटा-बड़ा 'राजनीति उद्योग' चल रहा होगा।

...तो फिर राजनीति को उद्योग का दर्जा देकर , उसकी लिस्टिंग कराईये शेयर मार्केट में और खेलने दीजिए उन सबको भी 'गेम' जो राजनीति में सामने आने की अतृत्‍प इच्‍छा की तड़प लिये कसमसा कर अपने 'हो रहे हानि' को लेकर बैचेन रहते हैं।

2 comments:

Unknown said...

राजनीति एक उद्योग है इस से तो कोई भी इनकार नहीं कर सकता. पर उसे उद्योग का कानूनी दर्जा दे दिया जाए यह कैसे सम्भव है? जो राजनीति का धंदा करते हैं वो ही कानून बनाते हैं. कौन बेबकूफ़ होगा जो अपने धंदे पर टेक्स लगा देगा? आज वह गोबर बेचकर अरबपति बन सकते हैं. समर्थकों से उपहार लेकर अपनी तिजोरियाँ भर सकते हैं. आने वाली सात पीढ़ीयों के लिए ऐयाशी का बंदोबस्त कर सकते हैं. और आप चाहते हैं वह इस सब पर टेक्स लगा दें.

samshad ahmad said...

यह मांग पागलपन नहीं है, जमीनी सच्‍चाई है! लगे रहो २-४ हजार साल में ये राजनीतिज्ञों के कानो तक पहुँच ही जायेगी