Thursday, May 22, 2008

भूकम्‍प के बाद

मेरी कविताएं -मानस-'भूकम्‍प के बाद'

:: भूकम्‍प के बाद ::

भूकम्‍प के बाद
आदमी -

आदमी को खोजता है / पहचानता है

जाति, धर्म, धन और बुद्धि...
सब ढ़केल दिये जाते हैं, पीछे

आगे बढ़ता है आदमी
हाथ थामने -
आदमी का

तेज हो रही है,
यह मद्धिम आवाज़ -
'मत करो प्रतीक्षा, भूकम्‍प का' !

Wednesday, May 21, 2008

चितांत

मेरी कविताएं -मानस-'चितांत'

:: चितांत ::

उन्‍हें,
भविष्‍य की चिन्‍ता हुई
डर समाया हुआ था
अन्‍दर तक, उनके

अब हरिया, मनिया ... हरवाह के भी
बेटे रूकूल जाने लगे हैं

क्‍या होगा, भविष्‍य... ?
खेतों का ! 'बच्‍चों' का !!

उड़ा दी अपवाह उन्‍होने
बच्‍चे उठाने वाले 'टोटका' की
स्‍कूल सूने हो गये
और वे निश्चिंत हो गये


(टीप :- (1) कुछ वर्षों पूर्व, सरगुजा क्षेत्र में बच्‍चे उठाने वाले 'टोटका' (अदृश्‍य अमानवीय शक्ति) के अपवाह के कारण महीनों तक ग्रामीण अपने बच्‍चों को घर के कमरे में ही बन्‍द करके रखते थे।
(2) सरगुजा में बंधुआ मजदूर को 'हरवाह' कहा जाता है, उसे वार्षिक मौखिक अनुबन्‍ध के आधार पर मामूली पारिश्रमिक धान और नकद के रूप में दिया जाता है, इसके ऐवज में वह साल-भर 24 घण्‍टे खेत-खलिहान की देख-रेख करता है। वैसे तो भारतीय कानून के अनुसार यह गैरकानूनी है परन्‍तु अब भी यहॉं के गॉंवों इसका चलन जारी है।)

Tuesday, May 20, 2008

ओ सुरगूँजा ! कुछ उन्‍मुक्‍त चित्र (3)

मेरी कविताएं-ओ सुरगूँजा ! कुछ उन्‍मुक्‍त चित्र

(3)

दिन को
ईंट-भट्ठों की चिमनियों से निकलते
काले-काले धुओं

और रात को
ठेकेदार के नथुनों से निकलते
सफेद धुओं से

जूझता 'उसका-जीवन'

पेट के लिए
यही है -
'दिन-रात' का श्रम...


(टीप : मेरा जन्‍म स्‍थान सरगुजा, जिसे कभी सूरगूँजा भी कहा जाता था छत्तीसगढ़ राज्‍य का आदिवासी बहुल जिला है। यहॉं जुल्‍मों और शोषणों की कथा बहुत पुरानी-लम्‍बी और अनवरत है। 'ओ सुरगूँजा! कुछ उन्‍मुक्‍त चित्र' के द्वारा मैंने शब्‍दों में कुछ के रेखाचित्र खींचने का प्रयास किया है।)

गणित में 67 प्रतिशत शिक्षक फेल !



गणित में 67 प्रतिशत शिक्षक फेल !



यूरोपीय कमीशन की 'स्‍वाध्‍याय योजना' के तहत शिक्षा विभाग ने छत्तीसगढ़ के सभी जिलों में अपने शासकीय शिक्षकों के गणितीय योग्‍यता का टेस्‍ट लिया और नतीजे में 67 प्रतिशत शासकीय शिक्षक पहली से आठवीं के गणित के टेस्‍ट में फेल हो गये।

छत्तीसगढ़ की शिक्षा व्‍यवस्‍था में इससे ज्‍यादा और क्‍या शर्म की बात होगी। जब शिक्षक स्‍वयं पहली से आठवीं के आसान गणित के प्रश्‍नों को नहीं बना पा रहे हैं तो वे अपने छात्रों को क्‍या सीखाते होंगे, इस बात की कल्‍पना से तन-मन कॉंप जाता है।


पहले शिक्षा में प्रयोगशाला होती थी और अब प्रयोगशाला में शिक्षा है। प्राथमिक शिक्षा की गुणवता सुधारने के नाम पर नित्‍य नये-नये प्रयोग किये जा रहे हैं और नतीजा आपके सामने है। कभी यूनिसेफ तो कभी यूरोपीय मिशन को मूर्ख गाय बना कर खूब दूध दूहा जा रहा है और घी-मलाई से अपना-अपना घर भरा जा रहा है। भाई ! विदेशी संस्‍थाएं, आर्थिक सहायता देने के लिए कुलबुलाती रहती हैं तो फिर भला शिक्षा पर प्रयोग क्‍यों न करे, हमारे ये होनहार स्‍वजन।

आंकड़ो के मकड़जाल में सुन्‍दर और पुरस्‍कार-खीचूँ आंकड़ों को 'जमाने' में तो आज सब माहिर हो गये हैं। साल-दो साल में उच्‍च अधिकारी ऐसे ही आंकड़ों के ग्राफ में ऊपर चढ़कर एक-दो राष्‍ट्रीय-अंतर्राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार 'मैनेज' कर ही लेता है। बस ! शासन को अपने प्रचार विज्ञापनों का जुगाड़ हो जाता है, बस शासन की गम्‍भीरता यहीं तक है और कुछ नहीं।

शिक्षकों को प्रशिक्षण देने का एक कमाऊ धन्‍धा शिक्षा विभाग के हाथों में आ गया है। सब कमा रहे हैं, ऊपर से नीचे तक - अधिकारी, बाबू, सामानों के सप्‍लायर, फर्जी टी.ए. एवं मानदेय में स्‍वयं शिक्षक और इसके ऑडिटर भी । शिक्षा विभाग के किसी प्रशिक्षण कार्यशाला में चले जाईये, हर आधे-एक घण्‍टे में चाय-पकौंड़ों के साथ खूब हँसी-ठिठोली होती मिल जायेगी। पढ़ाई यही कि कल नाश्‍ते में, खाने में क्‍या-क्‍या पसंद करेंगे, इस
प्रशिक्षण कार्यशाला में कितनी कमाई हो जायेगी और अगले में कितनी...फिर छठा वेतनआयोग में हम शिक्षकों का कितना भला हो जायेगा।

सरकारी स्‍कूल में 'मैडम' और 'गुरूजी' बच्‍चों को पढ़ाते कम ही मिलेंगे। या तो वे मोबाईल में गपियाते मिलेंगे या कोई अख़बार, पत्रिका के पन्‍ने पलटते - धूप सेंकते मिल जायेंगे।

भला हो 'मध्‍यान-भोजन' का, सुप्रीम कोर्ट की कड़ाई के कारण अब सभी सरकारी स्‍कूलों में मध्‍यान भोजन लगभग-लगभग नि‍यमित रूप से मिल रहा है और इसी बहाने स्‍कूल भी खूल रहा है, नहीं तो दूर-दराज के गॉंवों में स्‍कूल सा‍‍प्‍‍ताहिक हाट जैसा सप्‍ताह में एक-दो बार भाग्‍य से खुल जाता था।

गुरूजीयों में गज़ब का तालमेल होता है, जहॉं भी 2 या ज्‍यादा गुरूजी पदस्‍थ होते हैं वहॉं वे गणित के 'अल्‍टरनेट' नियम का पालन प्रवीणता से करते हैं और रोज सभी गुरूजी स्‍कूल न जाकर, आज एक तो कल दूसरा के नियम से मौज करते हैं।

शिक्षक जिन पर देश के भविष्‍य को दिशा देने, बच्‍चों के कोमल मन को एक उत्‍कृष्‍ठ कुम्‍हार जैसा एक लक्ष्‍य और आकार देने की महत्‍वपूर्ण जिम्‍मेदारी होती है, वह ही वर्तमान में सबसे अधिक निकम्‍मा बन गया है। ये गुरूजी, पढ़ाने के सिवाय बाकी सभी चीजों में बेहद गंभीर हैं। ईश्‍वर भला करे! हमारा, हमारे बच्‍चों का...

Monday, May 19, 2008

ओ सुरगूँजा! कुछ उन्‍मुक्‍त चित्र (2)

ओ सुरगूँजा! कुछ उन्‍मुक्‍त चित्र

(2)

गोदना पर बैठा
सॉंप
अब दिन में भी
फुँफकारता है
गॉंव में ठेकेदार के आने के पहले
सब ठीक था


(टीप : मेरा जन्‍म स्‍थान सरगुजा, जिसे कभी सूरगूँजा भी कहा जाता था छत्तीसगढ़ राज्‍य का आदिवासी बहुल जिला है। यहॉं जुल्‍मों और शोषणों की कथा बहुत पुरानी-लम्‍बी और अनवरत है। 'ओ सुरगूँजा! कुछ उन्‍मुक्‍त चित्र' के द्वारा मैंने शब्‍दों में कुछ के रेखाचित्र खींचने का प्रयास किया है।)

'राजनीति'को उद्योग का दर्जा दें...

'राजनीति' को उद्योग का दर्जा दें...

यह मांग पागलपन नहीं है, जमीनी सच्‍चाई है! भारत के वर्तमान परि‍दृश्‍य में 'राजनीति' एक उद्योग के रूप में फलने-फुलने में सभी उद्योगों से आगे है। आज राजनीति, एक प्राईवेट उद्योग के रूप में क्रियान्वित की जा रही है।

आप ही बताईये ! है कोई ऐसा उद्योग जिसने आजादी के 60 वर्षों के बाद अनन्‍त गुणा मुनाफा कमाया है ! आज सर्वाधिक धनी वही परिवार है जो 'राजनीति' में है या 'राजनीति' के प्रबन्‍ध में माहिर है।

देश (सरकार नहीं !) को घाटा यह हो रहा है कि इस राजनीति उद्योग से कमाया गये धन पर देश को काई टैक्‍स नहीं मिल पाता है। बेचारे नेतागण, अपने काले धन को छुपाने के नाना प्रकार के मनगढंत 'आय के वैधानिक स्रोत' की खोज में लगे रहते हैं। अपनी 'रबड़ी देवी' को ही लीजिए, गोबर बेचकर उन्‍होने करोड़ों रूपये 'जमा' कर लिए। बेचारा आम किसान ! आर्यों के समय से पीढि़याँ वंश दर वंश दूध/घी बेचकर भी दो जून की रोटी का मुश्किल से जुगाड़ कर पाता है।

जब राजनीति के व्‍यापार को अंतत: अलिखित रूप में हमने अपने लोकतंत्र के लिए स्‍वीकार मान ही लिया है तो इस सच्‍चाई को कानूनी मान्‍यता देने में कैसा शर्म ? आहिस्‍ते-आहिस्‍ते राजनीति ने लोकतंत्र को रखैल बना लिया और हम सब अपने-अपने छोटे-बड़े फाय़दों के लिए तमाशा देखते रहे, तो फिर 'बु‍द्धिजीवि बहस' के लिए बचा ही क्‍या है ?

मुझसे 'बहस' नहीं 'शास्‍त्रार्थ' कीजिए। बताईये, कौन सी राजनीतिक पार्टी, एक प्राईवेट लिमिटेड फर्म जैसा काम नहीं कर रही है। और निर्दलीय...?, जिसकी नीलामी सरेआम होती है ! वषों से मान्‍यता प्राप्त राजनैतिक दलों में अपने लोकतांत्रिक चुनाव नहीं हुए हैं, अगर हुए भी हैं तो सिर्फ दिखाने के चोंचले मात्र्। कितने विडम्‍बना की बात है कि और इन अलोकतांत्रिक पार्टियों को इस दुनिया के सबसे बड़े महान लोकतंत्र को चलाने की जिम्‍मेदारी दे दी गई है/दे दी जाती है।

आप जरा इस बात पर गौ़र कीजिए - नेहरू-गांधी परिवार का यह शाही खर्च क्‍या पंडित-इंदिरा-राजीव जी के मानदेय और पेंशन से चल रहा है ? फिर हमारी 'माया बहना' के खर्च का हिसाब...? समझ गये होन्गे।

आप! आप इन बड़े खिलाडि़यों से ध्‍यान जरा अपने आप-पास गली-मुहल्‍ले-गॉव-शहर के छुटभैये से तथाकथित नेताजी ! पर केन्द्रित कीजिए, उसके आय-व्‍यय पर ध्‍यान दीजिए...! मेरे क्रांतिकारी विचार की गंभीरता को आप समझ जायेंगे...अगर नहीं समझे तो...साफ है...! फिर आपका भी निश्‍चित रूप से कोई
छोटा-बड़ा 'राजनीति उद्योग' चल रहा होगा।

...तो फिर राजनीति को उद्योग का दर्जा देकर , उसकी लिस्टिंग कराईये शेयर मार्केट में और खेलने दीजिए उन सबको भी 'गेम' जो राजनीति में सामने आने की अतृत्‍प इच्‍छा की तड़प लिये कसमसा कर अपने 'हो रहे हानि' को लेकर बैचेन रहते हैं।

Sunday, May 18, 2008

ओ सुरगूँजा! कुछ उन्‍मुक्‍त चित्र

ओ सुरगूँजा! कुछ उन्‍मुक्‍त चित्र

(1)

नदी में नहाती औरतें
फटफटिया की आवाज सुन
पानी लपेट लेती हैं


शहर गईं औरतें
लौटी क्‍यों नहीं?


कौन पूछे -
बन्‍दूक से?




(टीप : मेरा जन्‍म स्‍थान सरगुजा, जिसे कभी सूरगूँजा भी कहा जाता था छत्तीसगढ़ राज्‍य का आदिवासी बहुल जिला है। यहॉं जुल्‍मों और शोषणों की कथा बहुत पुरानी-लम्‍बी और अनवरत है। 'ओ सुरगूँजा! कुछ उन्‍मुक्‍त चित्र' के द्वारा मैंने शब्‍दों में कुछ के रेखाचित्र खींचने का प्रयास किया है।)

बच्‍चे खेलने कहॉं जायें...?

मेरी कविताएं -बचपन-1-'बच्‍चे खेलने कहॉं जायें...?'

:: बच्‍चे खेलने कहॉं जायें...? ::

बच्‍चे,
खेलने कहॉं जायें...?

घर में
न ऑंगन है
न बाड़ी है
छत तो एक सपना है
पास-पड़ौस का भी यही हाल है

गलियों में
अतिक्रमणों का साम्राज्‍य है
सड़कों में
गाड़ि‍यों की रेलमपेल है
उद्यानों में
शहर का कबाड़खाना है

मैदान...तो...!
नेताओं के लिए आरक्षित है

फिर सचमुच !
बच्‍चे,
खेलने कहॉं जाएं...?

ऊफ! ये अच्‍छी गर्मी...

ऊफ! ये अच्‍छी गर्मी...

हम भारतीय बहुत अधिक आशावादी होते हैं, शायद यह भी एक कारण है हमारी कठोर जिजीविषा का।

बचपन में जब भी हम गर्मी के दिनों में बढ़ती गर्मी को लेकर हाय-तौबा मचाते थे तो मेरी दादी 'शकुन्‍तला' हमें समझाती थीं कि यह गर्मी का होना/बढ़ना कितना जरूरी है, क्‍योंकि जितनी अच्‍छी गर्मी पड़ेगी उतना अच्‍छा मानसून आयेगा। (मानसून-भारतीय उपमहाद्वीप का मौसमी वर्षा चक्र का पानी से भरा बादल)

'मानसून' यानी भारतीय उपमहाद्वीप का 'जीवन-रस'। अच्‍छे मानसून के बिना, भारतीय उपमहाद्वीप में जीवन की कल्‍पना भी नहीं की जा सकती है। यदि यह कहें कि यहॉं मानसून ही असली ईश्‍वर है तो कोई अतिश्‍योक्ति नहीं होगी।

बचपन में जब हम स्‍कूल में 'मानसून' का पारिभाषिक अर्थ पढ़े/समझे नहीं थे, तब भी इतना तो अवश्‍य समझते थे कि मानसून यानी 'बरसात'। तब हमारे नगर में गर्मियों के समय पीने/नहाने के पानी और हरी-ताजी सब्‍जियों की किल्‍लत होती थी। बचपन का कोमल मन इतना तो समझ जाता था कि पानी कितना जरूरी है, हमारे लिए और हरियाली के लिए।

तब जब बिजली गर्मी में एक ठण्‍डे हवा के झोंके जैसा दुर्लभ थी, हम सब बच्‍चे हाथ से बांस का गोल-गोल पंखा घुमाती दादी मॉं की नर्म-ठण्‍डी गोद को तकिया बनाने के लिए लड़ते थे और अच्‍छे मानसून की चाह में हम गर्मी का भी आनन्‍द लेकर गर्मी की छुट्टियों को आम/बिही/बेल के पेड़ के नीचे खेलते-कूदते बिता दिया करते थे।

आज भी जब अच्‍छी गर्मी पड़ती है तो 'दादी मॉं' की यादें नम ऑंखों में 'मानसूनी-चमक' के साथ समायी रहती है।

Saturday, May 17, 2008

रणनीति

मेरी कविताएं -विविध-1-'रणनीति'

:: रणनीति ::

आप
यदि बढ़ना चाहते हैं - आगे,
तो होना भी चाहिए,
तैयार
हटने को पीछे।

युद्ध की विजय-रणनीति यही है,
और सही भी।

कभी-कभी रूकना या पीछे हटना
लाभदायक ज्‍यादा होता है,
तुलनारूपेण आगे बढ़ने से।

हमेशा आगे बढ़ना
एक कारण भी हो सकता है,
सबसे पीछे होने का

भारत देश-वर्तमान-2-'सुबह-सुबह'

सुबह-सुबह

भारत देश में पहले सुबह-सुबह का नजारा होता था, लोटा में पानी लेकर दिशा-मैदान के लिए नदी/तालाब के पास निकलना। क्‍योंकि पुराने जमाने के लोग शौचालयों को अपने घर में या घर के आस-पास बनवाना अच्‍छा नहीं समझते थे। अब भी यह दृश्‍य देखने को मिलता है, ज्‍यादातर गॉंवों में या रेल्‍वे लाईनों के किनारे, परन्‍तु पहले की तुलना में कम। जनता की कुछ जागरूकता और सरकारी योजनाओं के कारण अब लोग अपने घर में शौचालय बनाने पर ध्‍यान दे रहे हैं।

शहर में सुबह-सुबह क्‍या होता है यह उत्‍सुकता इस देश से बाहर के लोगों को जानने की अवश्‍य होती होगी। एक समय था जब रे‍डियो (आकाशवाणी, बी.बी.सी. लंदन आदि) पर भजन और समाचार बड़े-बुजुर्ग लोग मुहल्‍ले में इकट्ठे होकर सुनते थे और सुबह ऑंख खुलते ही राम चरित मानस का पाठ या गंभीर समाचार वाचक की आवाज सुनाई देती थी।

परचून (किराना), हलवाई, नाई की दुकान में 4-5 अधेड़/बुजुर्ग लोगों का स्‍थाई जमावड़ा बना रहता था, जो घर-गॉंव-मुहल्‍ले से लेकर शहर, देश-विदेश सब जरूरी/गैरजरूरी मसलों पर चर्चा करते रहते थे।

अब शहर में सुबह-सुबह लोग डॉक्‍टर की क्लिनिक, दवाई दुकान, मोबाईल रिचार्ज दुकान के आस-पास चक्‍कर लगाते हुए उसके खुलने का इंतजार करते मिल जायेंगे।

आज 60 प्रतिशत भारतीय परिवार का कोई न कोई एक सदस्‍य ऐसा है जिसे नियमित स्‍थाई रूप से रोजाना दवा लेने की जरूरत होती है। डब्‍ल्‍यू.एच.ओ. की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2015 तक भारत की लगभग 25 प्रतिशत जनसंख्‍या मधुमेह (डायबटिज) से पीड़‍ित होगी। आज भारत में मधुमेह और उच्‍च रक्‍तचाप (हायपर टेंशन) के मरीजों की संख्‍या तेजी से बढ़ती जा रही है।

भारत आर्थिक विकास की दौड़ में अग्रणी है, लेकिन व्‍यक्तिगत स्‍वास्‍थ्‍य के मामले में खोखला होता जा रहा है।

मोबाईल ने तो भारत का रूप ही बदल दिया है। जो रोज 1 डालर से भी कम कमाता है, उसके पास भी मोबाईल है। हालात यह है कि लोग एक वक्‍त का भोजन यहॉं तक की दवाई तक छोड़ देते हैं पर मोबाईल रिचार्ज करवाना नहीं भूलते हैं।

पहचान

मेरी कविताएं -मानस-1-'पहचान'

:: पहचान ::

आप मुझे
इतना ही पहचानते हैं
जितना मैं
कि दिखते हैं, हम
आदमी जैसे


न आपने और न मैंने
समेटने की सोची, इस दूरी को

कहीं...! यही दूरी तो...
आदमी की पहचान नहीं ?


कर्फ्यू

मेरी कविताएं -धर्म-1-'कर्फ्यू'

:: कर्फ्यू ::

उस गॉंव के लोग
न देखे थे और न ही सुने थे -
कर्फ्यू,


एक दिन 'त्रिशूलों' के इर्द-गिर्द इकट्ठा हुआ
'ईश्‍वर'
और
'अल्‍लाह' तलवारों के


फिर खबर आयी
चार दिनों से कर्फ्यू है वहॉं

Thursday, May 15, 2008

भारत देश-वर्तमान-1-जिस किसी को 'ईश्‍वर' पर भरोसा न हो

दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र - भारत देश, सचमुच विविधताओं से भरा अजूबा देश है। भारत के इतिहास और वर्तमान को देखिए तो इस देश की जीवटता के लिए बहुचर्चित कविता के बोल स्‍मरण होते हैं - 'कुछ बात है कि हस्‍ती मिटती नहीं हमारी...'।

यह मेरा दावा है कि जिस किसी को 'ईश्‍वर' पर भरोसा न हो तो वह इस देश को आकर देखे, समझे और यहॉं जीवन जीकर 'भारतीयता' को आत्‍मसात करे, तो निश्चित रूप से उसे 'ईश्‍वर' पर अपने-आप विश्‍वास हो जायेगा, क्‍योंकि दरअसल भारत को यहॉं का लोकतंत्र नहीं चला रहा है... देश चल ही नहीं...दौड़ रहा है...भगवान भरोसे।

देश में लोकतंत्र तो है, जो कुछ ज्‍यादा नहीं...बहुत ही ज्‍यादा लोकतंत्र है। यह लोकतंत्र, स्‍थायित्‍व के साथ भ्रष्‍टतंत्र, लाठीतंत्र, भीड़तंत्र आदि कई रूपों में यहॉं की हवा-पानी-मिट्टी में समाहित है। जिसके बिना वर्तमान भारत की आप कल्‍पना भी नहीं कर सकते हैं।

भारत में आर्थिक समृद्धि की बहार आ गई है, चहुँ ओर विकास की गंगा बह रही है क्‍योंकि भारत के 99.999 प्रतिशत (निनानबे दशमलव नौ, नौ, नौ... प्रतिशत) लोग नैतिकता-सदाचार को ताक पर रख दिया है और हम सब भ्रष्‍ट हो गये हैं। 0.001 प्रतिशत में कुछ 'गान्‍धी' लोग बचे हैं, जो 'मीडिया' की सुर्खियों से दूर हैं। मैं स्‍वयं ऐसा 'गान्‍धी' तो बनना चाहता हूँ, पर वर्तमान में हूँ नहीं, क्‍योंकि भले ही 'पापी-पेट के लिए' वर्तमान में मैं भी उस भ्रष्‍ट तंत्र का एक हिस्‍सा हूँ। यदि मैं पूर्णत: 'गान्‍धी' बन गया तो मुझे मेरे घरवाले और यह समाज कहेगा - 'पगला गया है...'

इसमें आपको कोई आश्‍चर्य नहीं होना चाहिए कि भारत की आजादी के 60 वर्षों के बाद यहॉं की आम जनता की आम बोली में 'गान्‍धी' एक गाली है...जी हॉं एक गाली...। आम-बोलचाल में जो अपने वचन और कर्म में कुछ ईमानदारी लाने/करने की बात/काम करता है, उसे कहा जाता है - ... साला ... 'गान्‍धी' हो गया है।

ऐसा नहीं कि यहॉं लोकतंत्र के सड़न की बदबू से लोग वाकिफ नहीं हैं। सब लोग दुर्गंध को सुगन्‍ध के रूप में स्‍वीकार कर चुके हैं। सब लोग खुश हैं क्‍योंकि 'व्‍यवस्‍था' से सबको कहीं न कहीं, थोड़ा-ज्‍यादा फायदा हो रहा है।

कुल मिलाकर यही 'फायदा' वाली बात/सिद्धान्‍त ही भारत का वर्तमान सच है। सब लोग अपने स्‍वार्थ के लिए, कुछ भी करने को तैयार हैं...भले ही इससे समाज को, देश को, प्रकृति को कितना भी नुकसान क्‍यों न पहुँचे...

Tuesday, May 13, 2008

आंतकवाद और भारत -1- जयपुर बम विस्फोट 13 मई 2008

कुछ दिन बिल के अंदर छुपे रहने के बाद, पाकिस्तान के पाले हुए मुस्लिम आतंकवादियों ने पुन: जयपुर, राजस्थान , भारत में मानवता के विरूद्ध अपने नापाक मंसूबे जाहिर किये हैं और सीरियल बम विस्फोट करके निर्दोष 70 से अधिक लोगों की जान ले ली है।‍

आंतकवादी एक समस्‍या तो हैं पर उससे बड़ी समस्‍या हम भारतीयों की कमजोर-निकम्‍मी याददाश्‍त और दृढ़ इच्‍छाशक्ति की कमी है। हम तब जगते हैं जब दुर्घटना हो जाती है और दुर्घटना के दो-चार दिन बहुत ताम-झाम दिखाकर मीडिया पर 'माहौल' खींचने की कोशिश करते हैं ताकि जनता धोखे में रहे कि उससे वसूले जा रहे 'टैक्‍स' का सरकार वाकई समुचित सदुपयोग कर रही है और उसकी सुरक्षा? की संवैधानिक जिम्‍मे‍दारियों पर सरकार गंभीरता से कार्य कर रही है।

राजनैतिक दल तो सिर्फ हर घटना/दुर्घटना में अपने हित की ही सोचते और करते हैं। भाजपा को लीजिए वह तो अपने एन.डी.ए. गठबंधन सरकार और वर्तमान कांग्रेसी गठबंधन सरकार में हुए आतंकवादी घटनाओं की तुलना कर अपनी मान-मर्यादा बढ़ाना चाह रही है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा कि एनडीए के शासन के दौरान 5 आतंकवादी हमले हुए थे और पिछले तीन सालों (वर्तमान कांग्रेस सरकार) में 22 आतंकवादी हमले हुए हैं। इस तरह भाजपा इस आतंकवादी घटना का 'सदुपयोग' ? अपना चुनाव प्रचार में कर रही है।

मुख्‍य बात हमारी गंभीरता का है, देश में सुरक्षाबलों को शहीद बनाने के लिए एक लम्‍बी कतार खड़ी कर ली गई है पर देश में पुख्‍ता आतंकवाद विरोधी कानून नहीं है। (यह शर्म की बात ! ) आतंकवाद विरोधी कानून 'टाडा' को फिल्‍म स्‍टार संजय दत्त की ऊँची पहुँच के कारण हटा लिया गया और फिर आतंकवादियों के राजनैतिक पिट्ठुओं के दबाव के कारण 'पोटा' को बौना कर दिया गया। वाकई कांग्रेस सरकार आतंकवाद हेतु बहुत ही नरम है और इस सरकार में एक उद्देश्‍यपरक कार्ययोजना की कमी स्‍पष्‍ट रूप से दिखती है।

माना गल्‍तियॉं मानव का स्‍वभाव है और गल्‍तियों से सीख लेना मानव का गुण है। परन्‍तु गल्तियॉं, अब स्‍थाई गुण बनता जा रहा है। इसका गंभीर परिणाम अंतत: हम-सबको भुगतना पड़ेगा।

आतंकवादियों को मानव समझ कर उनसे मानवीय तरीके से पेश आने का व्‍यवहार हमें छोड़ना होगा। उनपर 'खोजो और मारो' की नीति अपनानी होगी।

हे महामहिम जी ! (राष्‍ट्रपति जी !) पिछले दो दशकों से जारी भारत में आतंकवादी घटनाओं (हजारों हत्‍याओं आदि...) के लिए जिम्‍मेदार कितने आतंकवादियों को मृत्‍युदण्‍ड दिया गया है ? शायद यह संख्‍या हमारी उंगलियों की गिनती के अन्‍दर ही होंगी। ... और यह भी बताईये कि जो आतंकवादी सैकड़ों निर्दोष लोगों की जान एक बम विस्‍फोट में ही ले लेता है उसे मात्र उम्रकैद (भारत में उम्रकैद मात्र 14 सालों की ही होती है) की सजा देना कितना उचित है ? वह ब्रेनवॉश आतंकवादी, फिर से अपना पुराना धन्‍धा (आतंकवाद, वाकई अब एक उद्योग है !) आसानी से अपना लेता है।