मेरी कविताएं-ओ सुरगूँजा ! कुछ उन्मुक्त चित्र
(4)
कई बार सोचा, उसने
कि 'नक्सलवादियों की बन्दूक' से कहकर
अपनी जमीन छूड़ा लूँ -
पटवारी के कब्जे से...
लेकिन...!
पटवारी के बाल-बच्चों का क्या दोष ?
और ऐसे ही कई 'धर्म-पालन' करने की चिन्ता ने
उसे
'देहाती' ही रहने दिया
जबकि वह अच्छी तरह जानता है,
कि पटवारी -
उसके बाल-बच्चों से ज्यादा महत्व,
'मूर्गे-बकरों' को देता है
(आदिवासी बहुल सरगुजा जिले में नक्सवाद/माओवाद का प्रभाव विगत एक दशक से ज्यादा रहा है। नक्सलवादी, जिले में अपनी समान्तर न्याय व्यवस्था मार्क्सवाद के सिद्धान्तों पर चलाते हैं। भारत की ग्रामीण प्रशासनिक व्यवस्था में जमीन/खेतों की नाप-जोख करने और हिसाब-किताब रखने वाला क्लर्क/बाबू यानी 'पटवारी' गॉंव की आधी समस्याओं का जड़ होता है।)
Sunday, June 1, 2008
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