Sunday, May 18, 2008

बच्‍चे खेलने कहॉं जायें...?

मेरी कविताएं -बचपन-1-'बच्‍चे खेलने कहॉं जायें...?'

:: बच्‍चे खेलने कहॉं जायें...? ::

बच्‍चे,
खेलने कहॉं जायें...?

घर में
न ऑंगन है
न बाड़ी है
छत तो एक सपना है
पास-पड़ौस का भी यही हाल है

गलियों में
अतिक्रमणों का साम्राज्‍य है
सड़कों में
गाड़ि‍यों की रेलमपेल है
उद्यानों में
शहर का कबाड़खाना है

मैदान...तो...!
नेताओं के लिए आरक्षित है

फिर सचमुच !
बच्‍चे,
खेलने कहॉं जाएं...?

2 comments:

सागर नाहर said...

हिन्दी चिट्ठा जगत में आपका हार्दिक स्वागत है, आप हिन्दी में बढ़िया लिखें और खूब लिखें यही उम्मीद है।

एक अनुरोध है कृपया यह वर्ड वेरिफिकेशन का टंटा हटा दें, यह टिप्पणी करते समय बड़ा परेशान करता है।

॥दस्तक॥
तकनीकी दस्तक
गीतों की महफिल

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया, बधाई.