ऊफ! ये अच्छी गर्मी...
हम भारतीय बहुत अधिक आशावादी होते हैं, शायद यह भी एक कारण है हमारी कठोर जिजीविषा का।
बचपन में जब भी हम गर्मी के दिनों में बढ़ती गर्मी को लेकर हाय-तौबा मचाते थे तो मेरी दादी 'शकुन्तला' हमें समझाती थीं कि यह गर्मी का होना/बढ़ना कितना जरूरी है, क्योंकि जितनी अच्छी गर्मी पड़ेगी उतना अच्छा मानसून आयेगा। (मानसून-भारतीय उपमहाद्वीप का मौसमी वर्षा चक्र का पानी से भरा बादल)
'मानसून' यानी भारतीय उपमहाद्वीप का 'जीवन-रस'। अच्छे मानसून के बिना, भारतीय उपमहाद्वीप में जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। यदि यह कहें कि यहॉं मानसून ही असली ईश्वर है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।
बचपन में जब हम स्कूल में 'मानसून' का पारिभाषिक अर्थ पढ़े/समझे नहीं थे, तब भी इतना तो अवश्य समझते थे कि मानसून यानी 'बरसात'। तब हमारे नगर में गर्मियों के समय पीने/नहाने के पानी और हरी-ताजी सब्जियों की किल्लत होती थी। बचपन का कोमल मन इतना तो समझ जाता था कि पानी कितना जरूरी है, हमारे लिए और हरियाली के लिए।
तब जब बिजली गर्मी में एक ठण्डे हवा के झोंके जैसा दुर्लभ थी, हम सब बच्चे हाथ से बांस का गोल-गोल पंखा घुमाती दादी मॉं की नर्म-ठण्डी गोद को तकिया बनाने के लिए लड़ते थे और अच्छे मानसून की चाह में हम गर्मी का भी आनन्द लेकर गर्मी की छुट्टियों को आम/बिही/बेल के पेड़ के नीचे खेलते-कूदते बिता दिया करते थे।
आज भी जब अच्छी गर्मी पड़ती है तो 'दादी मॉं' की यादें नम ऑंखों में 'मानसूनी-चमक' के साथ समायी रहती है।
Sunday, May 18, 2008
Subscribe to:
Post Comments (Atom)


0 comments:
Post a Comment