Tuesday, May 13, 2008

आंतकवाद और भारत -1- जयपुर बम विस्फोट 13 मई 2008

कुछ दिन बिल के अंदर छुपे रहने के बाद, पाकिस्तान के पाले हुए मुस्लिम आतंकवादियों ने पुन: जयपुर, राजस्थान , भारत में मानवता के विरूद्ध अपने नापाक मंसूबे जाहिर किये हैं और सीरियल बम विस्फोट करके निर्दोष 70 से अधिक लोगों की जान ले ली है।‍

आंतकवादी एक समस्‍या तो हैं पर उससे बड़ी समस्‍या हम भारतीयों की कमजोर-निकम्‍मी याददाश्‍त और दृढ़ इच्‍छाशक्ति की कमी है। हम तब जगते हैं जब दुर्घटना हो जाती है और दुर्घटना के दो-चार दिन बहुत ताम-झाम दिखाकर मीडिया पर 'माहौल' खींचने की कोशिश करते हैं ताकि जनता धोखे में रहे कि उससे वसूले जा रहे 'टैक्‍स' का सरकार वाकई समुचित सदुपयोग कर रही है और उसकी सुरक्षा? की संवैधानिक जिम्‍मे‍दारियों पर सरकार गंभीरता से कार्य कर रही है।

राजनैतिक दल तो सिर्फ हर घटना/दुर्घटना में अपने हित की ही सोचते और करते हैं। भाजपा को लीजिए वह तो अपने एन.डी.ए. गठबंधन सरकार और वर्तमान कांग्रेसी गठबंधन सरकार में हुए आतंकवादी घटनाओं की तुलना कर अपनी मान-मर्यादा बढ़ाना चाह रही है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा कि एनडीए के शासन के दौरान 5 आतंकवादी हमले हुए थे और पिछले तीन सालों (वर्तमान कांग्रेस सरकार) में 22 आतंकवादी हमले हुए हैं। इस तरह भाजपा इस आतंकवादी घटना का 'सदुपयोग' ? अपना चुनाव प्रचार में कर रही है।

मुख्‍य बात हमारी गंभीरता का है, देश में सुरक्षाबलों को शहीद बनाने के लिए एक लम्‍बी कतार खड़ी कर ली गई है पर देश में पुख्‍ता आतंकवाद विरोधी कानून नहीं है। (यह शर्म की बात ! ) आतंकवाद विरोधी कानून 'टाडा' को फिल्‍म स्‍टार संजय दत्त की ऊँची पहुँच के कारण हटा लिया गया और फिर आतंकवादियों के राजनैतिक पिट्ठुओं के दबाव के कारण 'पोटा' को बौना कर दिया गया। वाकई कांग्रेस सरकार आतंकवाद हेतु बहुत ही नरम है और इस सरकार में एक उद्देश्‍यपरक कार्ययोजना की कमी स्‍पष्‍ट रूप से दिखती है।

माना गल्‍तियॉं मानव का स्‍वभाव है और गल्‍तियों से सीख लेना मानव का गुण है। परन्‍तु गल्तियॉं, अब स्‍थाई गुण बनता जा रहा है। इसका गंभीर परिणाम अंतत: हम-सबको भुगतना पड़ेगा।

आतंकवादियों को मानव समझ कर उनसे मानवीय तरीके से पेश आने का व्‍यवहार हमें छोड़ना होगा। उनपर 'खोजो और मारो' की नीति अपनानी होगी।

हे महामहिम जी ! (राष्‍ट्रपति जी !) पिछले दो दशकों से जारी भारत में आतंकवादी घटनाओं (हजारों हत्‍याओं आदि...) के लिए जिम्‍मेदार कितने आतंकवादियों को मृत्‍युदण्‍ड दिया गया है ? शायद यह संख्‍या हमारी उंगलियों की गिनती के अन्‍दर ही होंगी। ... और यह भी बताईये कि जो आतंकवादी सैकड़ों निर्दोष लोगों की जान एक बम विस्‍फोट में ही ले लेता है उसे मात्र उम्रकैद (भारत में उम्रकैद मात्र 14 सालों की ही होती है) की सजा देना कितना उचित है ? वह ब्रेनवॉश आतंकवादी, फिर से अपना पुराना धन्‍धा (आतंकवाद, वाकई अब एक उद्योग है !) आसानी से अपना लेता है।

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