Saturday, February 7, 2009

भारतीय न्‍याय व्‍यवस्‍था : 28 हत्‍या = सजा 10 वर्ष कैद, 1 हत्‍या = सजा 4 माह

भारतीय न्‍याय व्‍यवस्‍था :
28 हत्‍या = सजा 10 वर्ष कैद, 1 हत्‍या = सजा 4 मा

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सन्दर्भ - http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/4071612.cms
कैब में लिफ्ट देकर जान लेने वाले 5 को कैद (4 Feb 2009, 0000 hrs IST,नवभारत टाइम्स)गुड़गांव।। दिल्ली जयपुर हाइवे पर कैब में लिफ्ट देकर 28 लोगों का मर्डर करने वाले सीरियल किलर गैंग के सरगना सहित 5 मुजरिमों को गुड़गांव की फास्ट टैक कोर्ट ने 10-10 साल कैद व 5-5 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है..............
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...स्‍पष्‍ट है कि... विश्‍व के सबसे बड़े लोकतन्‍त्र होने का ढिन्‍ढोरा पिटने वाली हमारी लोकतांत्रिक कानून की किताबों को लिखने/लिखवाने वालों का या इनको लागू करवाने वाले अदालतों का गणित बहुत ही कमजोर और शर्मनाक है...पर शर्म किसे है... ? इस नंगों की जमीं पर...???

Tuesday, August 5, 2008

क्‍या भारत का सुप्रीम कोर्ट बन्‍द हो रहा है ?


संदर्भित समाचार विश्‍व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के लिए शर्मसार करने वाला और सदमा पहुँचाने वाला है। गले तक भ्रष्‍टाचार में डुबे इस देश में न्‍याय की एक मात्र किरण सिर्फ सुप्रीम कोर्ट में ही नजर आती थी, अब यदि उसने भी.... भ्रष्‍ट तंत्र के विरूद्ध लाचारी व्‍यक्‍त करते हुए अपनी हार मान ली है तो ऐसे न्‍याय के मंदिर के अस्तित्‍व का क्‍या अर्थ ? कृपया बन्‍द कीजिए लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करने का यह ढ़कोसला। जनता के पसीने से निचोड़ी गई कमाई से चलने वाले ऐसे सब्‍जबाग़ दिखाने की दुकानदारी पर ताला लगाईये।
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संदर्भ साभार : जागरण-याहू इंडिया
(http://in.jagran.yahoo.com/news/national/general/5_1_4696689.html)
इस देश की भगवान भी मदद नहीं कर सकता
Aug 05, 04:24 pm

नई दिल्ली [जागरण ब्यूरो]। 'इस देश की मदद भगवान भी नहीं कर सकता, वह भी सिर्फ मूक दर्शक ही बना रहेगा।' यह निराशाजनक तीखी टिप्पणी सुप्रीमकोर्ट ने मंगलवार को की। कोर्ट सरकारी बंगलों में अवैध कब्जे के अपराध को गैरजमानती बनाए जाने का सुझाव ठुकराए जाने से नाराज और निराश था। कोर्ट ने सरकार के रवैये की निंदा करते हुए हुए कानून में संशोधन करने और धारा 441 को गैरजमानती अपराध बनाए जाने के मामले में सुनवाई मंगलवार को बंद कर दी।
न्यायमूर्ति बीएन अग्रवाल व न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी की पीठ सरकार के, कानून में संशोधन की जरूरत से इनकार किए जाने के जवाब से खासी नाखुश दिखी। पीठ ने अवैध कब्जेदारों को बाहर निकाले जाने के प्रति सरकार के ढीले रवैये पर तीखी टिप्पणियां कीं। पीठ ने कहा कि पूरी सरकारी मशीनरी भ्रष्ट है। राज्यों के मुख्य सचिव दिमाग का इस्तेमाल नहीं करते। उनमें क्लर्कों की राय से अलग जाने का साहस नहीं है। जिम्मेदारी तय करने के बाद भी क्या होगा। कानून है कि जो सरकारी आवास में ज्यादा दिन रहे, उसे बाहर निकाला जाए लेकिन कोई भी सरकार यह काम नहीं कर रही है।
न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी ने एक किताब का जिक्र किया जिसके मुताबिक यदि एक अधिकारी कानून लागू नहीं करता तो, उसे निकाल दिया जाए। जब कोई मंत्री कानून लागू नहीं करे तो, उसे निकाल दिया जाए लेकिन जब कोई सरकार कानून लागू न करे तो, किताब में उत्तार था कि उस देश की भगवान ही मदद कर सकता है। इस पर न्यायमूर्ति अग्रवाल ने कहा कि भगवान ही इस देश की मदद करे। लेकिन दूसरे ही क्षण उन्होंने कहा कि इस देश की मदद भगवान भी नहीं कर सकता। वह भी मूकदर्शक ही बना रहेगा।
कोर्ट ने कहा कि अवैध कब्जेदारों के रवैये को देखते हुए लगता है कि केंद्र व राज्य सरकारें कुछ नहीं करना चाहतीं। इस कोर्ट के आदेश पर सरकार साधारण कानून के तहत धीमी कार्रवाई करते हैं। जब केंद्र सरकार के वकील अमरेंद्र शरण ने कहा कि सरकार कानून में दी गई व्यवस्था के मुताबिक कार्रवाई करती है तो पीठ ने नाराज होते हुए कहा कि कोर्ट के दबाव के कारण, कोर्ट के हंटर पर। शरण ने कहा कि क्वासी [अ‌र्द्धन्यायिक] ज्यूडिशियल अथारिटी को सरकार निर्देश नहीं दे सकती। कोर्ट चाहे तो सुनवाई का समय तय कर दे।
कोर्ट ने कहा कि सरकार के जवाब के बाद इस मामले की आगे सुनवाई की कोई जरूरत रह जाती है। मामले की सुनवाई बंद करते हुए कोर्ट ने सरकार के वकील से कहा कि अब वे खुश होंगे। उनके अधिकारी जेल नहीं जाएंगे। हालांकि कोर्ट सरकारी बंगले खाली कराने के एकाकी मामलों की सुनवाई जारी रखेगा। राजस्थान सरकार की अर्जी पर आठ अगस्त को सुनवाई होगी।

Sunday, June 1, 2008

मेरी कविताएं-ओ सुरगूँजा ! कुछ उन्‍मुक्‍त चित्र (4)

मेरी कविताएं-ओ सुरगूँजा ! कुछ उन्‍मुक्‍त चित्र
(4)

कई बार सोचा, उसने
कि 'नक्‍सलवादियों की बन्‍दूक' से कहकर
अपनी जमीन छूड़ा लूँ -
पटवारी के कब्‍जे से...

लेकिन...!
पटवारी के बाल-बच्‍चों का क्‍या दोष ?
और ऐसे ही कई 'धर्म-पालन' करने की चिन्‍ता ने
उसे
'देहाती' ही रहने दिया

जबकि वह अच्‍छी तरह जानता है,
कि पटवारी -
उसके बाल-बच्‍चों से ज्‍यादा महत्‍व,
'मूर्गे-बकरों' को देता है

(आदिवासी बहुल सरगुजा जिले में नक्‍सवाद/माओवाद का प्रभाव विगत एक दशक से ज्‍यादा रहा है। नक्‍सलवादी, जिले में अपनी समान्‍तर न्‍याय व्‍यवस्‍था मार्क्‍सवाद के सिद्धान्‍तों पर चलाते हैं। भारत की ग्रामीण प्रशासनिक व्‍यवस्‍था में जमीन/खेतों की नाप-जोख करने और हिसाब-किताब रखने वाला क्‍लर्क/बाबू यानी 'पटवारी' गॉंव की आधी समस्‍याओं का जड़ होता है।)

Thursday, May 22, 2008

भूकम्‍प के बाद

मेरी कविताएं -मानस-'भूकम्‍प के बाद'

:: भूकम्‍प के बाद ::

भूकम्‍प के बाद
आदमी -

आदमी को खोजता है / पहचानता है

जाति, धर्म, धन और बुद्धि...
सब ढ़केल दिये जाते हैं, पीछे

आगे बढ़ता है आदमी
हाथ थामने -
आदमी का

तेज हो रही है,
यह मद्धिम आवाज़ -
'मत करो प्रतीक्षा, भूकम्‍प का' !

Wednesday, May 21, 2008

चितांत

मेरी कविताएं -मानस-'चितांत'

:: चितांत ::

उन्‍हें,
भविष्‍य की चिन्‍ता हुई
डर समाया हुआ था
अन्‍दर तक, उनके

अब हरिया, मनिया ... हरवाह के भी
बेटे रूकूल जाने लगे हैं

क्‍या होगा, भविष्‍य... ?
खेतों का ! 'बच्‍चों' का !!

उड़ा दी अपवाह उन्‍होने
बच्‍चे उठाने वाले 'टोटका' की
स्‍कूल सूने हो गये
और वे निश्चिंत हो गये


(टीप :- (1) कुछ वर्षों पूर्व, सरगुजा क्षेत्र में बच्‍चे उठाने वाले 'टोटका' (अदृश्‍य अमानवीय शक्ति) के अपवाह के कारण महीनों तक ग्रामीण अपने बच्‍चों को घर के कमरे में ही बन्‍द करके रखते थे।
(2) सरगुजा में बंधुआ मजदूर को 'हरवाह' कहा जाता है, उसे वार्षिक मौखिक अनुबन्‍ध के आधार पर मामूली पारिश्रमिक धान और नकद के रूप में दिया जाता है, इसके ऐवज में वह साल-भर 24 घण्‍टे खेत-खलिहान की देख-रेख करता है। वैसे तो भारतीय कानून के अनुसार यह गैरकानूनी है परन्‍तु अब भी यहॉं के गॉंवों इसका चलन जारी है।)

Tuesday, May 20, 2008

ओ सुरगूँजा ! कुछ उन्‍मुक्‍त चित्र (3)

मेरी कविताएं-ओ सुरगूँजा ! कुछ उन्‍मुक्‍त चित्र

(3)

दिन को
ईंट-भट्ठों की चिमनियों से निकलते
काले-काले धुओं

और रात को
ठेकेदार के नथुनों से निकलते
सफेद धुओं से

जूझता 'उसका-जीवन'

पेट के लिए
यही है -
'दिन-रात' का श्रम...


(टीप : मेरा जन्‍म स्‍थान सरगुजा, जिसे कभी सूरगूँजा भी कहा जाता था छत्तीसगढ़ राज्‍य का आदिवासी बहुल जिला है। यहॉं जुल्‍मों और शोषणों की कथा बहुत पुरानी-लम्‍बी और अनवरत है। 'ओ सुरगूँजा! कुछ उन्‍मुक्‍त चित्र' के द्वारा मैंने शब्‍दों में कुछ के रेखाचित्र खींचने का प्रयास किया है।)

गणित में 67 प्रतिशत शिक्षक फेल !



गणित में 67 प्रतिशत शिक्षक फेल !



यूरोपीय कमीशन की 'स्‍वाध्‍याय योजना' के तहत शिक्षा विभाग ने छत्तीसगढ़ के सभी जिलों में अपने शासकीय शिक्षकों के गणितीय योग्‍यता का टेस्‍ट लिया और नतीजे में 67 प्रतिशत शासकीय शिक्षक पहली से आठवीं के गणित के टेस्‍ट में फेल हो गये।

छत्तीसगढ़ की शिक्षा व्‍यवस्‍था में इससे ज्‍यादा और क्‍या शर्म की बात होगी। जब शिक्षक स्‍वयं पहली से आठवीं के आसान गणित के प्रश्‍नों को नहीं बना पा रहे हैं तो वे अपने छात्रों को क्‍या सीखाते होंगे, इस बात की कल्‍पना से तन-मन कॉंप जाता है।


पहले शिक्षा में प्रयोगशाला होती थी और अब प्रयोगशाला में शिक्षा है। प्राथमिक शिक्षा की गुणवता सुधारने के नाम पर नित्‍य नये-नये प्रयोग किये जा रहे हैं और नतीजा आपके सामने है। कभी यूनिसेफ तो कभी यूरोपीय मिशन को मूर्ख गाय बना कर खूब दूध दूहा जा रहा है और घी-मलाई से अपना-अपना घर भरा जा रहा है। भाई ! विदेशी संस्‍थाएं, आर्थिक सहायता देने के लिए कुलबुलाती रहती हैं तो फिर भला शिक्षा पर प्रयोग क्‍यों न करे, हमारे ये होनहार स्‍वजन।

आंकड़ो के मकड़जाल में सुन्‍दर और पुरस्‍कार-खीचूँ आंकड़ों को 'जमाने' में तो आज सब माहिर हो गये हैं। साल-दो साल में उच्‍च अधिकारी ऐसे ही आंकड़ों के ग्राफ में ऊपर चढ़कर एक-दो राष्‍ट्रीय-अंतर्राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार 'मैनेज' कर ही लेता है। बस ! शासन को अपने प्रचार विज्ञापनों का जुगाड़ हो जाता है, बस शासन की गम्‍भीरता यहीं तक है और कुछ नहीं।

शिक्षकों को प्रशिक्षण देने का एक कमाऊ धन्‍धा शिक्षा विभाग के हाथों में आ गया है। सब कमा रहे हैं, ऊपर से नीचे तक - अधिकारी, बाबू, सामानों के सप्‍लायर, फर्जी टी.ए. एवं मानदेय में स्‍वयं शिक्षक और इसके ऑडिटर भी । शिक्षा विभाग के किसी प्रशिक्षण कार्यशाला में चले जाईये, हर आधे-एक घण्‍टे में चाय-पकौंड़ों के साथ खूब हँसी-ठिठोली होती मिल जायेगी। पढ़ाई यही कि कल नाश्‍ते में, खाने में क्‍या-क्‍या पसंद करेंगे, इस
प्रशिक्षण कार्यशाला में कितनी कमाई हो जायेगी और अगले में कितनी...फिर छठा वेतनआयोग में हम शिक्षकों का कितना भला हो जायेगा।

सरकारी स्‍कूल में 'मैडम' और 'गुरूजी' बच्‍चों को पढ़ाते कम ही मिलेंगे। या तो वे मोबाईल में गपियाते मिलेंगे या कोई अख़बार, पत्रिका के पन्‍ने पलटते - धूप सेंकते मिल जायेंगे।

भला हो 'मध्‍यान-भोजन' का, सुप्रीम कोर्ट की कड़ाई के कारण अब सभी सरकारी स्‍कूलों में मध्‍यान भोजन लगभग-लगभग नि‍यमित रूप से मिल रहा है और इसी बहाने स्‍कूल भी खूल रहा है, नहीं तो दूर-दराज के गॉंवों में स्‍कूल सा‍‍प्‍‍ताहिक हाट जैसा सप्‍ताह में एक-दो बार भाग्‍य से खुल जाता था।

गुरूजीयों में गज़ब का तालमेल होता है, जहॉं भी 2 या ज्‍यादा गुरूजी पदस्‍थ होते हैं वहॉं वे गणित के 'अल्‍टरनेट' नियम का पालन प्रवीणता से करते हैं और रोज सभी गुरूजी स्‍कूल न जाकर, आज एक तो कल दूसरा के नियम से मौज करते हैं।

शिक्षक जिन पर देश के भविष्‍य को दिशा देने, बच्‍चों के कोमल मन को एक उत्‍कृष्‍ठ कुम्‍हार जैसा एक लक्ष्‍य और आकार देने की महत्‍वपूर्ण जिम्‍मेदारी होती है, वह ही वर्तमान में सबसे अधिक निकम्‍मा बन गया है। ये गुरूजी, पढ़ाने के सिवाय बाकी सभी चीजों में बेहद गंभीर हैं। ईश्‍वर भला करे! हमारा, हमारे बच्‍चों का...