सुबह-सुबह
भारत देश में पहले सुबह-सुबह का नजारा होता था, लोटा में पानी लेकर दिशा-मैदान के लिए नदी/तालाब के पास निकलना। क्योंकि पुराने जमाने के लोग शौचालयों को अपने घर में या घर के आस-पास बनवाना अच्छा नहीं समझते थे। अब भी यह दृश्य देखने को मिलता है, ज्यादातर गॉंवों में या रेल्वे लाईनों के किनारे, परन्तु पहले की तुलना में कम। जनता की कुछ जागरूकता और सरकारी योजनाओं के कारण अब लोग अपने घर में शौचालय बनाने पर ध्यान दे रहे हैं।
शहर में सुबह-सुबह क्या होता है यह उत्सुकता इस देश से बाहर के लोगों को जानने की अवश्य होती होगी। एक समय था जब रेडियो (आकाशवाणी, बी.बी.सी. लंदन आदि) पर भजन और समाचार बड़े-बुजुर्ग लोग मुहल्ले में इकट्ठे होकर सुनते थे और सुबह ऑंख खुलते ही राम चरित मानस का पाठ या गंभीर समाचार वाचक की आवाज सुनाई देती थी।
परचून (किराना), हलवाई, नाई की दुकान में 4-5 अधेड़/बुजुर्ग लोगों का स्थाई जमावड़ा बना रहता था, जो घर-गॉंव-मुहल्ले से लेकर शहर, देश-विदेश सब जरूरी/गैरजरूरी मसलों पर चर्चा करते रहते थे।
अब शहर में सुबह-सुबह लोग डॉक्टर की क्लिनिक, दवाई दुकान, मोबाईल रिचार्ज दुकान के आस-पास चक्कर लगाते हुए उसके खुलने का इंतजार करते मिल जायेंगे।
आज 60 प्रतिशत भारतीय परिवार का कोई न कोई एक सदस्य ऐसा है जिसे नियमित स्थाई रूप से रोजाना दवा लेने की जरूरत होती है। डब्ल्यू.एच.ओ. की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2015 तक भारत की लगभग 25 प्रतिशत जनसंख्या मधुमेह (डायबटिज) से पीड़ित होगी। आज भारत में मधुमेह और उच्च रक्तचाप (हायपर टेंशन) के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है।
भारत आर्थिक विकास की दौड़ में अग्रणी है, लेकिन व्यक्तिगत स्वास्थ्य के मामले में खोखला होता जा रहा है।
मोबाईल ने तो भारत का रूप ही बदल दिया है। जो रोज 1 डालर से भी कम कमाता है, उसके पास भी मोबाईल है। हालात यह है कि लोग एक वक्त का भोजन यहॉं तक की दवाई तक छोड़ देते हैं पर मोबाईल रिचार्ज करवाना नहीं भूलते हैं।
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1 comments:
भारत के सुबह का ही नहीं पूरे दिन का सच है, यह।
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