Tuesday, May 20, 2008

ओ सुरगूँजा ! कुछ उन्‍मुक्‍त चित्र (3)

मेरी कविताएं-ओ सुरगूँजा ! कुछ उन्‍मुक्‍त चित्र

(3)

दिन को
ईंट-भट्ठों की चिमनियों से निकलते
काले-काले धुओं

और रात को
ठेकेदार के नथुनों से निकलते
सफेद धुओं से

जूझता 'उसका-जीवन'

पेट के लिए
यही है -
'दिन-रात' का श्रम...


(टीप : मेरा जन्‍म स्‍थान सरगुजा, जिसे कभी सूरगूँजा भी कहा जाता था छत्तीसगढ़ राज्‍य का आदिवासी बहुल जिला है। यहॉं जुल्‍मों और शोषणों की कथा बहुत पुरानी-लम्‍बी और अनवरत है। 'ओ सुरगूँजा! कुछ उन्‍मुक्‍त चित्र' के द्वारा मैंने शब्‍दों में कुछ के रेखाचित्र खींचने का प्रयास किया है।)

1 comments:

Udan Tashtari said...

सशक्त चित्र खींच लिया है सफलता के साथ महिला श्रमिकों के शोषण का.