मेरी कविताएं-ओ सुरगूँजा ! कुछ उन्मुक्त चित्र
(3)
दिन को
ईंट-भट्ठों की चिमनियों से निकलते
काले-काले धुओं
और रात को
ठेकेदार के नथुनों से निकलते
सफेद धुओं से
जूझता 'उसका-जीवन'
पेट के लिए
यही है -
'दिन-रात' का श्रम...
(टीप : मेरा जन्म स्थान सरगुजा, जिसे कभी सूरगूँजा भी कहा जाता था छत्तीसगढ़ राज्य का आदिवासी बहुल जिला है। यहॉं जुल्मों और शोषणों की कथा बहुत पुरानी-लम्बी और अनवरत है। 'ओ सुरगूँजा! कुछ उन्मुक्त चित्र' के द्वारा मैंने शब्दों में कुछ के रेखाचित्र खींचने का प्रयास किया है।)
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1 comments:
सशक्त चित्र खींच लिया है सफलता के साथ महिला श्रमिकों के शोषण का.
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