दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र - भारत देश, सचमुच विविधताओं से भरा अजूबा देश है। भारत के इतिहास और वर्तमान को देखिए तो इस देश की जीवटता के लिए बहुचर्चित कविता के बोल स्मरण होते हैं - 'कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी...'।
यह मेरा दावा है कि जिस किसी को 'ईश्वर' पर भरोसा न हो तो वह इस देश को आकर देखे, समझे और यहॉं जीवन जीकर 'भारतीयता' को आत्मसात करे, तो निश्चित रूप से उसे 'ईश्वर' पर अपने-आप विश्वास हो जायेगा, क्योंकि दरअसल भारत को यहॉं का लोकतंत्र नहीं चला रहा है... देश चल ही नहीं...दौड़ रहा है...भगवान भरोसे।
देश में लोकतंत्र तो है, जो कुछ ज्यादा नहीं...बहुत ही ज्यादा लोकतंत्र है। यह लोकतंत्र, स्थायित्व के साथ भ्रष्टतंत्र, लाठीतंत्र, भीड़तंत्र आदि कई रूपों में यहॉं की हवा-पानी-मिट्टी में समाहित है। जिसके बिना वर्तमान भारत की आप कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।
भारत में आर्थिक समृद्धि की बहार आ गई है, चहुँ ओर विकास की गंगा बह रही है क्योंकि भारत के 99.999 प्रतिशत (निनानबे दशमलव नौ, नौ, नौ... प्रतिशत) लोग नैतिकता-सदाचार को ताक पर रख दिया है और हम सब भ्रष्ट हो गये हैं। 0.001 प्रतिशत में कुछ 'गान्धी' लोग बचे हैं, जो 'मीडिया' की सुर्खियों से दूर हैं। मैं स्वयं ऐसा 'गान्धी' तो बनना चाहता हूँ, पर वर्तमान में हूँ नहीं, क्योंकि भले ही 'पापी-पेट के लिए' वर्तमान में मैं भी उस भ्रष्ट तंत्र का एक हिस्सा हूँ। यदि मैं पूर्णत: 'गान्धी' बन गया तो मुझे मेरे घरवाले और यह समाज कहेगा - 'पगला गया है...'
इसमें आपको कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि भारत की आजादी के 60 वर्षों के बाद यहॉं की आम जनता की आम बोली में 'गान्धी' एक गाली है...जी हॉं एक गाली...। आम-बोलचाल में जो अपने वचन और कर्म में कुछ ईमानदारी लाने/करने की बात/काम करता है, उसे कहा जाता है - ... साला ... 'गान्धी' हो गया है।
ऐसा नहीं कि यहॉं लोकतंत्र के सड़न की बदबू से लोग वाकिफ नहीं हैं। सब लोग दुर्गंध को सुगन्ध के रूप में स्वीकार कर चुके हैं। सब लोग खुश हैं क्योंकि 'व्यवस्था' से सबको कहीं न कहीं, थोड़ा-ज्यादा फायदा हो रहा है।
कुल मिलाकर यही 'फायदा' वाली बात/सिद्धान्त ही भारत का वर्तमान सच है। सब लोग अपने स्वार्थ के लिए, कुछ भी करने को तैयार हैं...भले ही इससे समाज को, देश को, प्रकृति को कितना भी नुकसान क्यों न पहुँचे...
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